स्वस्थ आलोचना की दरकार: पूर्वाग्रह बनाम लोकतांत्रिक परिपक्वता

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एडिटर अटैक @ डॉ. प्रशांत राजावत– रामनाथ गोयनका व्याख्यान में इस बार इंडियन एक्सप्रेस मीडिया समूह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को मुख्य वक्ता के रूप में आमंत्रित किया। जैसे ही यह सूचना मीडिया और साहित्य के एक खास धड़े तक पहुँची, विरोध की पारंपरिक स्क्रिप्ट शुरू हो गई। जाने-माने पत्रकार विष्णु नागर से लेकर तथाकथित चिंटू चौकड़ी तक आलोचना के नाम पर सोशल मीडिया में हंगामा मचाने लगे।

किसी ने कहा— “इस आदमी को व्याख्यान का अर्थ तक नहीं पता।”
किसी ने कहा— “जिसने कभी कलम नहीं उठाई, वह व्याख्यान देने चला है।”
ऐसी तमाम टिप्पणियाँ आलोचना कम, पूर्वाग्रह ज़्यादा थीं।

हकीकत यह रही कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तय समय पर व्याख्यान में पहुँचे और न सिर्फ रामनाथ गोयनका की निर्भीक पत्रकारिता को नमन किया, बल्कि खुले मंच से इंडियन एक्सप्रेस की सत्यपरक पत्रकारिता की सराहना भी की। शालीनता, संतुलन और लोकतांत्रिक मर्यादा—तीनों का स्पष्ट प्रदर्शन हुआ।

अब ज़रा पृष्ठभूमि में चलते हैं।
पिछले वर्ष इसी आयोजन में प्रधानमंत्री दर्शक दीर्घा में बैठे थे और इंडियन एक्सप्रेस के संपादक राजकमल झा मंच से सरकार की तीखी आलोचना कर रहे थे। उनका भाषण वायरल हुआ और उसी धड़े ने तब कहा— “मोदी के सामने ऐसी बात कहने का साहस… कमाल है!”
यह भी कहा गया कि मोदी अंदर-ही-अंदर ज़रूर तमतमाए होंगे।

और अब?
वही मोदी, जिनके सामने सरकार को सीधे चुनौती दी गई थी—
वही मोदी, उसी अख़बार के आयोजन में—
उसी संपादक की मेज़बानी में—
फिर उसी व्याख्यान माला में मुख्य वक्ता बनकर उपस्थित होते हैं।

यह केवल राजनीतिक घटना नहीं है, यह मन की गहराई और लोकतांत्रिक बड़प्पन का उदाहरण है। इसे समझना होगा।

आलोचना एक सुंदर परंपरा है, लेकिन पूर्वाग्रह से मुक्त आलोचना ही समाज को मजबूत बनाती है।

यदि मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर रैम्प वॉक करते हैं और कोई तंज कसता है कि “इस पाँच फुटिए ने कभी रैम्प वॉक किया भी है?”—तो यह तंज बचकाना है। सचिन की विशेषज्ञता रैम्प नहीं, क्रिकेट है। वे क्रिकेट के भगवान हैं, इसलिए नेतृत्व करते हैं—चाहे मंच कोई भी हो।

उसी तरह, प्रधानमंत्री मोदी को व्याख्यान का शाब्दिक अर्थ पता है या नहीं—यह मुद्दा नहीं है।
वे भारत के सर्वोच्च जनप्रतिनिधि हैं—यही उनकी यूएसपी है।
और इसी नाते वे व्याख्यान के मुख्य वक्ता हैं।

स्वस्थ समाज के लिए स्वस्थ आलोचना की सदैव दरकार रही है—और रहेगी।
लेकिन आलोचना जब बुद्धि से नहीं, द्वेष से की जाए, तो वह खुद अपनी विश्वसनीयता खो देती है।

(एडिटर अटैक — मीडिया मिरर संपादक का नियमित स्तंभ)

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