बात-मुलाकात: कृषि पत्रकारिता के पितामह डॉ. महेंद्र मधुप से संवाद

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बात-मुलाकात – मीडिया मिरर की साप्ताहिक साक्षात्कार श्रृंखला बात-मुलाकात में इस बार अतिथि हैं भारत में कृषि पत्रकारिता के पितामह कहे जाने वाले शरद कृषि पत्रिका के सम्पादक डॉ महेंद्र मधुप जी।
हालाँकि बात मुलाकात हर रविवार रात 10 बजे प्रसारित होता है मीडिया मिरर पर। पर तकनिकी कारणों से इसबार प्रसारण नहीं हो पाया था।

डॉ महेंद्र मधुप जी का परिचय:-

2 मार्च 1947 को जोधपुर में जन्म हुआ। मात्र 12 वर्ष की आयु में आकाशवाणी जयपुर से कहानी का सजीव प्रसारण और लेखन की शुरुआत। 1972 में राजस्थान विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग से राजस्थान की साहित्यिक पत्रकारिता पर पीएचडी की, जो राजस्थान की पहली पत्रकारिता पीएचडी थी। 1976 में राजस्थान राज्य कृषि विपणन बोर्ड से जुड़े। 1982 से दूरदर्शन में डेढ़ हजार से अधिक कृषि कार्यक्रमों की एंकरिंग की।

1984 से लम्बे समय तक दूरदर्शन और आकाशवाणी में ग्रामीण कार्यक्रम समन्वय समिति के सचिव रहे। वर्ष 2005 से वर्तमान में पुणे से प्रकाशित शरद कृषि पत्रिका हिंदी संस्करण के यशस्वी सम्पादक हैं। राष्ट्रपति द्वारा आत्माराम पुरस्कार(2005) वर्ष 2007 में मिला। भारत में कृषि पत्रकारिता का सर्वोच्च पुरस्कार चौधरी चरण सिंह सम्मान(2007) वर्ष 2008 में मिला।
( अब तो यही इच्छा है की अंतिम साँस लूँ तो मेरी जुबान में गंगाजल नहीं, किसान वैज्ञानिकों की जीत का जज़्बा हो: महेंद्र मधुप)

ऐसे महान व्यक्तित्व व कृषि पत्रकारिता के पितामह डॉ महेंद्र मधुप जी से मीडिया मिरर के सम्पादक प्रशांत राजावत की विशेष बातचीत।

सवाल 1, कृषि पत्रकारिता के पितामह कहे जाते हैं आप। शरद कृषि पत्रिका के हिंदी संस्करण के सम्पादक हैं। कृषि पत्रकारिता की वर्तमान स्थिति से कितने संतुष्ठ हैं।

जवाब:- कृषि प्रधान देश भारत में कृषि पत्रकारिता की घोर उपेक्षा रही है। प्रिंट और टीवी दोनों में ही गांवों के तेजस्वी चेहरों को कमतर बताया जाता है शहरों की तुलना में। दूरदर्शन का कृषि कार्यक्रम भी नए जमाने के अनुकूल नहीं बन पाया। इसी कारण कृषि दर्शन की शुरुआत की। पहले से सुधार दिखा। पर नए कृषि जगत की अपेक्षाओं को पूरा नहीं कर सका। कृषि चैनल की ग्रामीण क्षेत्रो में दर्शक संख्या कम है। इसका कुछ हिस्सा अच्छा है। रही बात प्रिंट मीडिया की तो दैनिक अखबारो में किसानों के लिए साप्ताहिक परिशिष्ठ और कृषि पत्र पत्रिकाओं में खेती करने की पद्धति होती है। इन सबके बारे में किसान जानता है। उसे ऐसे नवाचारों की जानकारी चाहिए जिससे कृषि उत्पादकता बढे। किसान वैज्ञानिकों, किसानों को मीडिया में जगह मिले।
आश्चर्य करेंगे राष्ट्रपति भवन में 3 सप्ताह तक मेहमान रहे राजस्थान के 2 किसान वैज्ञानिक मुख्य समाचार नहीं बन सके।
दैनिक भास्कर कार्यालय में आये किसान वैज्ञानिकों ने कहा की अहा जिंदगी मेरे द्वारा लिखी जा रही श्रृंखला से कई किसान जीरो से हीरो बन गए। पर अगले अंक से इस श्रृंखला को बन्द कर दिया गया। क्यों। यह स्थिति भारत में कृषि पत्रकारिता की दुर्दशा का दर्पण है।

सवाल 2, कृषि पत्रकारिता आज भी मुख्यधारा की पत्रकारिता नहीं मानी जाती। जबकि कृषि प्रधान देश में रहते हैं। इसका उदाहरण दिल्ली से चल रहे न्यूज़ चैनल हैं। उनमे शायद 24 घंटे में 1 प्रतिशत कवरेज कृषि क्षेत्र को लेकर हो।

जवाब:- यह स्थिति बदलने वाली है। कृषि क्षेत्र में 100 फीसदी विदेशी निवेश की मंजूरी से ग्रामीण क्षेत्रों में व्यापक उपभोक्ता संभावना के कारण बाजार शक्तियां नई व्यूह रचना बना रही हैं। तब कवरेज मिलेगा। कृषि क्षेत्र के देशी विदेशी घरानो को मीडिया की पगडंडी से किसान के दिमाग पर काबिज़ होने का मौका मिला है।

सवाल 3, भारत का मुख्यधारा का मीडिया चाहे वो चैनल हों या अख़बार। फ़िल्मी खबरों से भरे हैं। चैनलों में सास बहु के शो चल रहे हैं। पर कृषि पत्रकारिता कहाँ है। कैसे तय हो कृषि पत्रकारिता का भविष्य।

जवाब:- बाजार शक्तियों के हित रक्षा में कृषि पत्रकारिता का भविष्य उज्जवल है। पर इससे किसानो का कितना भला होगा इसका जवाब हर कोई जानता है।

सवाल 4, कई सम्मान आपको मिले, राष्ट्रपति द्वारा आपको आत्माराम पुरस्कार मिला। क्या मायने हैं इन सम्मानों के आपके जीवन में।

जवाब:- पुरस्कारों का महत्व यही रहा की देशभर के किसान वैज्ञानिकों से सम्पर्क का शंखनाद हुआ। और पुरस्कार से प्राप्त राशि ज़रूरत मंद बच्चों के शिक्षा के काम आई।

सवाल 5, पत्रकारिता की नई पीढ़ी यानि नए पत्रकार कृषि पत्रकारिता बिलकुल नहीं करना चाहते। क्या कोई उपाय है की पत्रकारों में कृषि पत्रकारिता को लेकर उत्साह जागे।

जवाब:- हाँ अन्य बीट के पत्रकारों की तुलना में कृषि पत्रकार दूसरे दर्जे के माने जाते हैं। किसान समर्थक पत्रकार लघु पत्र पत्रिकाएं निकालकर प्रेरणास्पद उदाहरण कायम करें। तभी शायद नई पीढ़ी के पत्रकार कृषि पत्रकारिता का महत्व समझें।

सवाल 6, चूँकि आप कृषि पत्रकार हैं तो क्या बताएँगे कृषि पत्रकारिता के मानक क्या हैं।

जवाब:- कृषि पत्रकारिता एक मिशन है। कृषि पत्रकारिता को मिशन मानने वाला पत्रकार ही किसानों के लिए स्वीकार्य कृषि पत्रकार होगा।

सवाल 7, दूरदर्शन ने पिछले दिनों एक किसान चैनल शुरू किया है। इस सरकारी प्रयास को कैसे लेते हैं आप। क्या आप देखते हैं ये चैनल।

जवाब:- किसान चैनल के लिए जिस उच्च स्तरीय गुरु कमिटी ने सिफारिश की थी उसमे मैं भी विशेष आमंत्रित सदस्य था। अभी इस चैनल को एक वर्ष हो चुका है। इसलिए इसका मूल्यांकन व्यवहारिक नहीं होगा। इसका 24 घंटे का स्वरूप रिदम नई दुनिया के लिए उपयुक्त नहीं। यह किसानों की अपेक्षा के अनुरूप लोकप्रिय नहीं हो सका। मैं भी कभी कभार ही देखता हूँ। कृषि मीडिया और कृषि वैज्ञानिक के बीच गहरे संवाद से इसकी शक़्ल और सूरत बदलनी चाहिए। इसकी परिकल्पना को शक़्ल देने वाले कृषि समर्थक नहीं बल्कि किसान समर्थक हों।

सवाल 8, कोई दैनिक अख़बार है जो सिर्फ कृषि पत्रकारिता पर आधारित हो।

जवाब:- महाराष्ट्र के सकाल ग्रुप ने पुणे से एग्रो वन कृषि दैनिक की शुरुआत की। जो चल रहा है।

सवाल 9, देश के कुछ प्रमुख कृषि पत्रकार जो आपकी नजर में हो। बेहतर काम कर रहे हों।

जवाब:- प्रिंट मीडिया में दिल्ली के देविन्दर शर्मा, पुणे के डॉ बीडी पंवार, जोधपुर के मोईनुद्दीन चिश्ती हैं। वहीँ टीवी मीडिया में दूरदर्शन के हरेन्द्र गर्ग, किसान चैनल के हंसराज नायक अच्छा काम कर रहे हैं कृषि पत्रकारिता में। etv की अन्नदाता टीम की जितनी सराहना की जाये कम है। जयपुर दूरदर्शन के वीरेंद्र परिहार मीडिया की चकाचोंध से मुक्त रहे तो उनमे काफी संभावना हैं। दूरदर्शन से सेवानिवृत्त रघुनाथ सिंह अमिट हस्ताक्षर हैं।

सवाल 10, कृषि पत्रकारिता तब ही मुख्यधारा की मीडिया में दिखती है जब खाद्यान संकट हो या किसान की आत्महत्या। इससे इतर भी कुछ मुद्दे हैं जो वाकई उठने चाहिए।

जवाब:- मुद्दे उठे या नहीं। इसका निर्णय मीडिया घरानो के मालिक करते हैं। वो जब चाहते हैं अच्छा कवरेज होता है। मुद्दे उठने चाहिए। पर ये मीडिया मालिकों की नीति का हिसा है।

सवाल 11, अपने पसन्द का कोई एक टीवी पत्रकार और एक प्रिंट पत्रकार बताइये। अपना पसंदीदा एक नया और एक पुराना हिंदी लेखक बताइये।

जवाब:- एनडीटीवी के रवीश कुमार। प्रिंट से यशवंत व्यास। कृषि क्षेत्र की पत्रकारिता से टीवी से हरेन्द्र गर्ग और प्रिंट से देविन्दर शर्मा मेरी पसन्द हैं। हिंदी लेखक नए में दुष्यंत कुमार और पुराने में मुंशी प्रेमचंद पसन्द हैं।

सवाल 12, शरद कृषि पत्रिका कितने राज्यों में उपलब्ध है। क्या और विस्तार की योजना है।

जवाब:- शरद कृषि पत्रिका लगभग हर प्रदेश में उपलब्ध है। मराठी में पत्रिका किसानों की आवाज़ है। 21वीं सदी में शरद कृषि स्वर्णिम पृष्ठ होगी कृषि पत्रकारिता में।

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