मार्क टली को याद कर रहे बीबीसी के वरिष्ठ पत्रकार राजेश प्रियदर्शिनी

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भारत में बीबीसी की पहचान रहे सर मार्क टली का जाना दुखद है. वृहद बीबीसी परिवार के लिए तो मानो पितामह के गुज़र जाने जैसा है. मेरी ख़ुशक़िस्मती है कि उनसे कई बार बातें करने का अवसर मिला लेकिन मुझसे पहले वाली पीढ़ी ज़्यादा ख़ुशक़िस्मत थी जिसने उनको और क़रीब से, उनके सक्रियता वाले दौर में देखा. वे कुछ समय से बीमार चल रहे थे लेकिन कुछ महीनों पहले तक ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ में उनका कॉलम देखकर आश्वस्ति होती थी कि वे ठीक हैं. उनसे सीखने लायक़ अनेक बातों में एक बात तो यही थी कि वे हर किसी से, हर समय सीखते रहते थे.

भारत के समाज और राजनीति की उनकी समझ बहुत गहरी थी लेकिन वे अक्सर अपने वाक्य की शुरुआत कुछ यूँ करते थे, “मुझे तो ज़्यादा मालूम नहीं, आप बताइए कि…” जिन बातों की उन्हें पक्की जानकारी होती थी उनके बारे में भी कहते थे, “जहाँ तक मुझे मालूम है…” मुझसे कई बार झारखंड के बारे में बातें करते थे. उनसे बात करते हुए डर तो कभी नहीं लगा क्योंकि उनके व्यक्तित्व में ज्ञान के आतंक की जगह विनम्र विद्वता की आभा थी,

लेकिन इस बात का एहसास मुझे रहता था कि वे संतालों और मुंडाओं के बारे में उतना ही जानते थे जितना उत्तर प्रदेश के निषादों और बिहार के मुसहरों के बारे में या फिर केरल के पानियन या मुथुवन लोगों के बारे में. उनकी किताब ‘No Full stops in India’ हर उस व्यक्ति को पढ़नी चाहिए जो भारत को समझना चाहता है, वे सबसे पहले अच्छी तरह यही समझाते हैं कि भारत समझ में क्यों नहीं आता. उन्होंने एक ब्रितानी अर्थशास्त्री के हवाले से कहीं लिखा था—Whatever you can rightly say about India, the opposite is also true” यानी भारत के बारे में जो आप सचमुच कह सकते हैं उसके ठीक विपरीत बात भी सच है.

उनसे हर मुलाक़ात के बाद यह विस्मय रह जाता था कि वे इतने अदभुत कैसे हैं. एक ऋषि जैसा जीवन जीकर विदा हुए सर मार्क को श्रद्धांजलि!

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