बनारस के वरिष्ठ पत्रकार गोपेश पांडेय का निधन, उन्हें याद कर रहे वरिष्ठ पत्रकार शशि शेखर

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वाराणसी। बनारस के वरिष्ठ पत्रकार गोपेश पांडेय के हालिया निधन से पत्रकारिता जगत ने एक सधे हुए, निर्भीक और गरिमामय व्यक्तित्व को खो दिया है। उनके जाने पर जाने-माने पत्रकार शशि शेखर ने भावुक स्मृतियों के साथ उन्हें याद किया।

शशि शेखर लिखते हैं कि रविवार 11 जनवरी की सुबह साथी रजनीश त्रिपाठी का संदेश मिला— “गोपेश पांडेय जी का आज सुबह वाराणसी में निधन हो गया।” इतवार की सुबह इतनी मनहूस कैसे हो सकती है—यह सोचते हुए वे तब से अब तक उनके साथ की तस्वीरें तलाशते रहे, लेकिन अपनी लापरवाह आदत के कारण वे स्मृतियाँ केवल मन में ही रह गईं।

गोपेश पांडेय, दैनिक ‘आज’ में शशि शेखर के सीनियर थे। पहली मुलाकात सितंबर 1980 के आखिरी सप्ताह में हुई थी, जब राममोहन पाठक जी ने उनका परिचय कराते हुए कहा था— “ये हमारे चीफ रिपोर्टर हैं।” ऊँचा कद, ऐंठी मूँछें और एक्स-रे जैसी पैनी आँखें—पहली झलक में ही वे प्रभाव छोड़ जाते थे।

शशि शेखर बताते हैं कि वे सीधे तौर पर गोपेश जी की मातहती में नहीं रहे, लेकिन विशेष असाइनमेंट में उनकी कॉपी वे ही पास किया करते थे। गोपेश जी का एक वाक्य आज भी स्मृति में है— “अगर अच्छी हिंदी सीखनी है तो मेरी रिपोर्ट और भास्कर जी का कॉलम पढ़ा करो।”
कॉपी जाँचते समय उनकी सजगता और भाषा के प्रति उनकी प्रतिबद्धता मिसाल थी।

अगले करीब बीस वर्षों तक एक ही संस्थान में काम करते हुए अनेक मुलाकातें हुईं। काशी हिंदू विश्वविद्यालय के प्रोफेसरों, राजनेताओं, साहित्यकारों और नामचीन हस्तियों के किस्से वे पूरे आत्मविश्वास और जिम्मेदारी के साथ सुनाया करते थे। अपनी बात पूरी ताकत से कहना और लिखना उनकी शख्सियत का हिस्सा था।

‘आज’ के संक्रमणकाल में, जब संस्थान पीढ़ीगत बदलाव से गुजर रहा था, गोपेश पांडेय राममोहन पाठक जी के सबसे भरोसेमंद सहयोगियों में थे। आलोचनाओं और भीतर की राजनीति से वे भली-भांति परिचित थे, लेकिन कभी प्रतिशोधी नहीं बने। गलत बात वे बर्दाश्त नहीं करते थे, पर उनका विरोध भी मर्यादित और साहसपूर्ण होता था।

एक घटना का जिक्र करते हुए शशि शेखर लिखते हैं कि जब एक वरिष्ठ सहयोगी के खिलाफ अनुचित टिप्पणी की गई, तो गोपेश जी ने बिना उत्तेजित हुए, लेकिन सख्त स्वर में हस्तक्षेप किया— “आप इन्हें मारेंगे और हम लोग देखते रहेंगे?”
यही एक उदाहरण उनकी पूरी शख्सियत को बयान करने के लिए काफी है।

लखनऊ में हुए एक गंभीर सड़क हादसे के बाद वे बच तो गए, लेकिन उनका स्वभाव बदल गया। पत्नी के असामयिक निधन के बाद उनका झुकाव आध्यात्म की ओर बढ़ गया था। वे अक्सर कहते थे— “जो लिखा है, वही होगा।”

कुछ महीने पहले हुई आखिरी बातचीत को याद करते हुए शशि शेखर लिखते हैं— “आपने कह दिया, मेरे लिए वही बहुत है।”
उन्हें अंदाज़ा नहीं था कि यही आखिरी बातचीत होगी।

शशि शेखर की पंक्तियों में गोपेश पांडेय आज भी जीवित हैं—
“अब आपसे मुलाकात सिर्फ अतीत के गलियारों में होगी। हम जीवन को बहुत बड़ा मान लेते हैं, पर वह उतना बड़ा भी नहीं होता, जितना हम मान बैठते हैं।”

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